Thursday, June 23, 2011

किस्सा-ए-झाड़ू

शायद हमारी अम्मी सही ही फरमाती हैं . यही कि हमें अपने अब्बू से कई नाकाबिलेतारिफ आदतें पैदाइशी मिली हुई हैं. 
पहले तो हमें यकीन नहीं था पर उस दिन के वाकये ने हमें अपनी अम्मी की बातों की सच्चाई से वाकिफ करा दिया. बात कुछ ख़ास नहीं है. हमारे अब्बू के हिसाब से कोई भी सामान खरीदना किसी हुनर से कम नही है. ज़ाहिर सी बात है कि उन्ही की तरह हमें भी यही लगता है कि इस हुनर में हम इतने माहिर हैं कि हमारा कोई सानी ही नहीं.
बस इन्हीं कुछ ख्यालों को जेहन में समेटे हम पहुँच गए मित्तल जी की परचून की दुकान में. खरीदना क्या था - एक अदद झाड़ू. अरे नहीं.... आप किसी ग़लतफ़हमी का शिकार न बनें. यही कि हम बेहद सफाई पसंद इंसान हैं. ऐसा कतई नहीं है. वह तो बस अपने मकान मालिक को हौसला देने के लिए कि उनका मकान हमारे हाथों में साफ़ सुथरा रहेगा खासकर के उसका  संगेमरमर का फर्श.
ये लो हम भी बातों बातों में खो से जाते हैं. हाँ तो वापस दुकान पर चलें. हमने आस पास नज़र दौड़ाई तो देखा कि दुकान के बाहर, कड़ी धूप में पांच - छह झाड़ू बड़ी ही करीने से लगे हुए थे. बस फिर क्या था. हमारे अन्दर का हुनर जाग गया. हमने दुकानदार से कहा - 'भाईसाहब हम झाड़ू खुद ही पसंद कर लेते हैं !'.   
लगभग छलांगें मारते हुए पहुँच गए झाडुओं के पास. दिल-ओ-दिमाग के हर कल पुर्जे का इस्तेमाल करते हुए हमने हर झाड़ू का मुआयना किया. लम्बाई कितनी है? तीलियाँ कितनी हैं? रस्सी ठीक से बंधी है या नहीं? धूल तो झड़ जाएगी न ठीक से? कहीं पकड़ वाले सिरे का रंग बेहूदा तो नहीं? और भी न जाने क्या क्या....



खैर काफी जद्दोजहद के बाद एक किनारे पर पड़ा झाड़ू पसंद आ गया. जैसे ही उसे लेकर चले कि दुकानदार ने आवाज़ लगाईं - ' अरे मैडम वह तो हमारे दुकान का झाड़ू है. उस से तो हम रोज़ दुकान की सफाई करते हैं. आप कोई दूसरा पसंद कर लें.'
इतना सुनते ही हम ऐसे शर्मशार हुए कि पूछो मत. बस किसी तरह दुकानदार का पसंद किया हुआ झाड़ू लेकर गिरते पड़ते घर पहुंचे. कानों को हाथ लगाया कि फिर फिर अपने हुनर का इस्तेमाल नहीं करेंगे.
आज सोमवार है. सब्जीमंडी जाना है. अन्दर का हुनर शैतान के रूप में जाग रहा है. ..........

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